सावन पर निबंध हिंदी मे (Sawan Essay in Hindi)

भारत के राष्ट्रीय नागरिक कैलेंडर में हिंदू वर्ष का पाँचवाँ महीना है, जो जुलाई के अंत में शुरू होता है और अगस्त के तीसरे सप्ताह में समाप्त होता है, अगले पूर्णिमा के दिन।

तमिल कैलेंडर में, इसे इसवानी के रूप में जाना जाता है और सौर वर्ष का पांचवा महीना है। चंद्र धार्मिक कैलेंडर में, अरावा अमावस्या पर शुरू होता है और वर्ष का चौथा महीना होता है। यह महिना बंगाली कैलेंडर का चौथा महीना है। यह वर्षा ऋतु का दूसरा महीना भी है।

श्रावण का महीना भारत के पूरे उप-महाद्वीप के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन से जुड़ा है। कई हिंदुओं के लिए, श्रावण का महीना उपवास का महीना है। कई हिंदू हर सोमवार को भगवान शिव और हर मंगलवार देवी पार्वती का उपवास करते है। इस महीने के उपवास को स्थानीय रूप से “मंगला गौरी व्रत” के रूप में जाना जाता है।

इस महीने के त्योहार 

इस महीने मे पूरे भारत देश मे कई सारे त्योहार होते है। जैसे की कृष्ण जन्माष्टमी, रक्षा बंधन, नार्यल पूर्णिमा, नाग पंचमी, बसवा पंचमी, अवनि अवित्तम, श्री बालादेव का जन्मदिन, गाम पूर्णिमा, कजरी पूर्णिमा, पुत्रदा एकादशी, पावितरा एकादशी, जंध्यम पूर्णिमा, सलोनों, श्रावणी मेला।

लोकप्रिय संस्कृति

इस मौसम में विभिन्न ग्रंथों, जैसे कि संस्कृत पाठ, मेघादुता, कालीदास द्वारा मनाया जाता है। उनके शीर्षक में सावन के साथ कई फिल्में भी बनी हैं, जैसे आया सावन झूम के, सावन भादों, सोलवा सावन, सावन कोई आने दो, प्यार सावन आदि।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी, कई गीत थीम के आसपास हैं, बरसात के मौसम के दौरान राधा-कृष्ण, साथ ही बॉलीवुड गीत है जैसे की; सावन की रितु ऐ, सावन की महेन पवन करे सोर।

श्रावण के दौरान गोवा, महाराष्ट्र और कर्नाटक के क्षेत्रों में हिंदू समुदाय शाकाहारी भोजन करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानसून के मौसम में वर्ष के इस समय समुद्री भोजन प्राप्त करना मुश्किल होता है और यह माना जाता है कि इस अवधि के दौरान अधिकांश मछली पालते हैं और श्रावण में मछली पकड़ने से पूरे वर्ष मछली पकड़ने में वृद्धि होती है।

मारकण्डेय

अपने भारत देश मे सावन महीने को बहुत ही पवित्र माना जाता है। इस महीने मे कई सारे त्योहार होते है। इसी महीने मे मारकण्डेय नामक  व्यक्ति जो ऋषि मरकंडु के पुत्र थे। उन्होंने इसी सावन महीने मे भगवान महादेव को कड़ी तपस्या करके प्रसन्न किया था। उसके बाद मारकण्डेय ने महादेव से लंबी आयु की कृपा प्राप्त की थी।

इसके लिए भगवान महादेव ने मारकण्डेय को लंबी आयु के लिए कुछ ऐसी मंत्र शक्तिया प्रधान की जिनके सामने हम सभी के मृत्यु के देवता यमराज भी कुछ नहीं कर सके।

समुद्र मंथन 

पौराणिक इतिहास में ऐसा कहा जाता है की, इसी सावन महीने में देवताओं और राक्षसों ने मिलकर समुद्र मंथन का काम किया था। जिससे देवताओं को अमृत प्राप्त हुआ।

लेकिन कहते है ना की एक ही सिक्के के दो पहलू होते है। वैसे ही हुआ, समुद्र मंथन करके अमृत तो मिला लेकिन उसी के साथ समुद्र मंथन का काम खतम होते ही हलाहल नाम का विष भी निकल रहा था।

जिससे पूरा दुनिया को बहुत बड़ा खतरा था। इसीलिए भगवान महादेव ने यही विष खुद प्राशन किया। जिसे उन्होंने अपने कंठ के समा लिया और दुनिया को उस बड़े खतरे से बचा लिया। लेकिन ये विष प्रभावी था की, इसे पीने से देवों के देव महादेव जी का कंठ भी नीला पड गया। तबसे महादेव को नीलकंठ महादेव के नाम से भी जाना जाता है।

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